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Vivartvad (विवर्तवाद)

पंचदशी ब्रह्मानंदान्तर्गत (अद्वैतानन्द) मेंश्लोक संख्या 49, 50, 51 में सृष्टि निर्माण की तीसरा सिद्धान्त कार्य पैदा होता है कुछ समय तक रहता है और फिर लुप्त हो जाता है। जैसे- स्वर्ण (कारण) में आभूषण (कार्य) बना, कुछ दिन रहा,फिर लुप्त हो गया परन्तु स्वर्ण बना रहता है। इसी तरह मिट्टी और घड़े को समझ लें।…

Jeevan ka uddeshya (जीवन का उद्देश्य)

यदि अब तक जीवन का उद्देश्य निश्चित न किया हो तो आज ही, इसी समय कर लो। उद्देश्य हीन जीवन व्यर्थ है। एक ओर चलो, केवल परमात्माकी ओर बढ़ो। जीवनकी प्रत्येक क्रिया और प्रत्येक संकल्प केवल उन्हींके लिये हो।

Kshanbhangur (क्षणभंगुर)

यह जीवन क्षणस्थायी है, संसार के भोग-विलास की सामग्रियाँ भी क्षणभंगुर हैं। यथार्थ रूप से वे ही जीवित हैं जो दूसरों के लिये जीवन धारण करते हैं। शेष तो मृत से भी अधम हैं।  

Brahm (ब्रह्म)

श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रंथ कोटिभ:। ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:।। जो विभिन्न ग्रंथों में कहा गया है, उसे (मैं) यहाँ आधे श्लोक में कह रहा हूँ – “ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है तथा जीव ब्रह्म ही है, कोई दूसरा नहीं”।  हरि ऊँ !

Gurudev (गुरुदेव)

‘आचार्यं मां विजानीयात्’ गुरु को मेरा रूप ही जानो अर्थात् गुरु और भगवान् में कोई भेद नहीं है। जो गुरु-वचनों में दृढ़ विश्वास रखता है, गुरुदेव जिसपर प्रसन्न रहते हैं, उसे कोई विघ्न नहीं घेरते। गुरु माता-पिता-पति सब हैं, उनके बिना संसार में कहीं गति नहीं। गुरु सर्वशक्तिमान और वाँछाकल्पतरु हैं।

Vichar (विचार)

विचार करो- मेरे चित्तमें जो अशान्ति या असंतोष है, वह किस अभावके कारण है ? क्या मैं अनेक प्रकारके अभावोंसे घिरा हुआ हूँ ? वह कौन-सी वस्तु है, जिसके प्राप्त होने पर सारे अभाव पूर्ण हो जायेंगे ? निश्चय ही ऐसी वस्तु एकमात्र परमात्मा है। जब तक वे नहीं मिलेंगे, तब तक इस जीवनके अभावोंसे…

ध्यान (Dhyan)

ध्यान में एकाग्रता का महत्त्व उतना नहीं है जितना महत्त्व भाव का है। जहाँ मन को एकाग्र करना है, वहाँ ईश्वर-बुद्धि होना परम आवश्यक है। इसके बगैर जो ध्यान होगा वह लौकिक होगा और वह बेकार सिद्ध होगा।

Advait Makarand

Gyan ka Path (ज्ञान का पथ)

उत्तिष्ठत  जाग्रत  प्राप्य  वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ {(हे मनुष्यों !) उठो, जागो (अपनी चेतना में लौट आओ)। श्रेष्ठ (ज्ञानी) पुरुषों के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करो। विद्वान् मनीषियों के मतानुसार – ज्ञान प्राप्ति का वह पथ, छुरे (चाकू) की तीक्ष्ण धार पर चलने जैसा ही दुर्गम है।}

Pravritti Nivritti (प्रवृत्ति निवृत्ति)

प्रवृत्तौ जायते रागो निर्वृत्तौ द्वेष एव हि।  निर्द्वन्द्वो बालवद् धीमान् एवमेव व्यवस्थितः॥   (प्रवृत्ति में राग होता है, निवृत्ति में द्वेष होता है इसीलिए बुद्धिमान पुरुष बालक की भांति द्वन्द रहित होकर जैसे हैं उसी भाव में स्थित रहते हैं।) 

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