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आत्मा वह है जो स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण तीनों शरीर के परे है। पांच कोशों के भीतर है और तीनों अवस्थाओं (जाग्रत अवस्था, स्वप्नावस्था, सुषुप्तावस्था) का साक्षी है। जिसका स्वरुप सत, चित, आनंद है, वह सत है। देश काल वस्तु से परिछिन्न नहीं है। स्वयं प्रकाशवान है। उसको किसी का आश्रय नहीं है। वह आनंदमय है। 
हरि !

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