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॥श्री गुरूवे नमः॥

(परम् पूज्य परमादर्श आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी श्री अभयानन्द सरस्वती जी महराज)

कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा पुण्यवती च तेन।
अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिन् लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेतः॥
(स्कंन्दपुराणम्)

(कुल पवित्र हो जाता है, माता कृतार्थ हो जाती है, वह धरती पुण्यवती हो जाती है (वह देश धन्य हो जाता है)
जहाँ उस अपार विज्ञानानंदघन समुद्ररूप परब्रह्म परमात्मा में सर्वथा लीन चित्त वाले महान सपूत जन्म लेते हैं।)

परम् पूज्य परमादर्श आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अभयानन्द सरस्वती जी महाराज के कार्यों का संक्षिप्त परिचय:
परिचय-परम् पूज्य परमादर्श आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अभयानन्द सरस्वती जी ब्रम्हलीन परम् पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती (संस्थापक चिन्मय मिशन) के प्रिय शिष्य रहे हैं। चिन्मय मिशन के सांदीपनी आश्रम, सिद्धबाड़ी जनपद धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में वर्ष 1987 से 1989 तक वेदान्त के अनेकानेक ग्रन्थों एवं सनातन धर्म के विषयों का अध्ययन किया है। आपने चिन्मय-मिशन के भोपाल एवं लखनऊ शाखा में 3 वर्षों तक ब्रम्हचारी शौनक चैतन्य के नाम से आध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया है। वर्ष 1992 से आप स्वतन्त्र रूप से वेदान्त ज्ञान की अलख जगा रहे हैं। वर्ष 2004 में सन्यास-दीक्षा ग्रहण करके आप स्वामी अभयानन्द सरस्वती जी के नाम से जाने गए। आपकी उद्भट विद्वता, वेदांत ज्ञान के लम्बे समय से प्रचार प्रसार और सुदूर तक फैली आपकी अनुपम ख्याति से प्रभावित होकर दिनाँक ६ जून २०१७ को परमादर्श आचार्य महामण्लेश्वर समिति द्वारा, परमादर्श आचार्य महामण्लेश्वरों की पावन उपस्थिति में आपका “परमादर्श महामण्लेश्वर” के रूप में पट्टाभिषेक किया गया ; तभी से आप परमादर्श आचार्य महामण्लेश्वर प० पू० स्वामी अभयानंद सरस्वती जी के नाम से जाने जा रहे हैं.

परमादर्श आचार्य महामण्लेश्वर समिति द्वारा परमादर्श आचार्य महामण्लेश्वरों की पावन उपस्थिति में आपका “परमादर्श महामण्लेश्वर” के रूप में पट्टाभिषेक किया गया ; तभी से आप परमादर्श आचार्य महामण्लेश्वर प० पू० स्वामी अभयानंद सरस्वती जी के नाम से जाने जा रहे हैं

आप आद्य शंकराचार्य जी के मत को मानने वाले सभी वेदान्त शास्त्रों के ज्ञाता है साथ ही साथ रामचरित मानस, भगवत गीता, श्रीमद भागवत महापुराण आदि विषयों पर भी आपकी सारगर्भित ‘प्रसन्न-गम्भीर प्रवचन शैली‘ भी श्रवण योग्य है। आप उत्तर प्रदेश के कई शहरों में आश्रम स्थापित करके सनातन धर्म की अखण्ड परम्परा को गति प्रदान कर रहे हैं, जिसमें हरिद्वार, लखनऊ, मेरठ एवं सीतापुर प्रमुख है।

हरिद्वार आश्रम, शौनक कुटीर, हरिपुर कला, हरिद्वार (उत्तरांचल):
परिचय-सर्वप्रथम दिनांक 19 जून 1998 में इस आश्रम की नींव रखी गयी। स्वामी जी ने अपने ब्रम्हचारी शौनक चैतन्य के नाम से इस कुटिया का निर्माण किया, जो आज 17 कमरों से युक्त आश्रम के रूप में परिणित हो गया है। आश्रम में सत्संग-हाॅल, रसोई भण्डार निर्मित है। वर्तमान में एक बड़ा सत्संग-हाल एवं कुछ अन्य कमरे निर्माणाधीन है। इस आश्रम का कुशल एवं अनुशासन पूर्ण संचालन प.पू. ब्रम्हचारी प्रणव चैतन्य द्वारा किया जा रहा है।
गतिविधि:
1. प्रातः एवं सांयकाल संध्या बेला पर भगवद्गीता, अष्टावक्रगीता, विष्णु सहस्त्रनाम,शिवमहिम्नस्त्रोत आदि के वाचन के साथ पूजन-वन्दन किया जाता है।
2. प्रतिवर्ष जून मास में वार्षिक ध्यान एवं प्रवचन शिविर का आयोजन होता है, जिसमें साधकगण आकर एक सप्ताह तक लाभ प्राप्त करते हैं।
3. प्रतिवर्ष निर्जला एकादशी के दिन आश्रम के माध्यम से यात्रियों को मिष्ठान एवं शरबत का वितरण किया जाता है।
4. संस्कृत पठन-पाठन एवं ब्रम्हविद्या ग्रहण करने के उद्येश्य से हरिद्वार में निवास करने वाले विद्यार्थियों को भी आश्रम में स्थान दिया जाता है।
आर्ष विद्या गुरूकुलम् वेदान्तपुरम् (पपनामऊ), फैजाबाद रोड, लखनऊ (उ0प्र0):
परिचय-परम्पूज्य स्वामी अभयानन्द सरस्वती जी द्वारा 18 अप्रैल 2002 को इस आश्रम की स्थापना की गयी तथा भव्य ‘‘दक्षिणामूर्तेश्वर महादेव मन्दिर‘‘ की प्राण- प्रतिष्ठा 02 फरवरी 2007 में की गयी। आश्रम में सत्संग हाल (मुख्यालय) का उद्घाटन प.पू. शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम द्वार किया गया। यहाँ पर यज्ञशाला, संत निवास, सन्यासी-कक्ष, गुरूदेव की कुटिया, रसोई, भण्डार-घर एवं गौशाला का भी निर्माण किया गया है। इस आश्रम का प्रबन्धन युवा स्वामी ओंकारानन्द सरस्वती द्वारा किया जा रहा है। आश्रम परिसर में 70ग108त्र7560 वर्ग फीट के एक सत्संग हाल का नींव पूजन (विजयादशमी) 06 अक्टूबर 2011 में किया गया है, जो निर्माणाधीन है। आश्रम का संचालन श्री शौनक आर्ष विद्या प्रन्यास ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है।
 आगामी योजनाए:
1. आश्रम में पत्रिका एवं पुस्तक प्रकाशनार्थ एक मुद्रणालय (प्रेस) लगाया जाना।
2. स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती जी की पूर्ति स्ािापना।
3. सन्यासी-कक्षों का निर्माण।
4. आध्यात्मिक पुस्तकालय का निर्माण।
आश्रम द्वारा संचालित गतिविधियाँ:
1. प्रत्येक रविवार को प्रातः 09ः00 बजे से 09ः30 बजे तक हवन तदुपरान्त पूज्य स्वामी जी द्वारा निर्धारित ग्रन्थ के विषय पर 11ः00 बजे तक सामूहिक स्वाध्याय।
2. परमपूज्य स्वामी जी द्वारा किये गये प्रवचनों पर पाण्डुलिपि तैयार करना तथा पुस्तक प्रकाशन का कार्य। इसमें आप कोई भी सेवा ले सकते हैं।
3. श्री दक्षिणामूर्तेश्वर महादेव मन्दिर में अखण्ड ज्योति जलती रहती है, उसके लिए सेवा स्वीकार्य है।
4. आश्रम संचालन हेतु रख-रखाव निधि स्थापित है, जिसमें-
सहयोग राशि
मासिक…………………………………………………. श्रद्धानुसार
वार्षिक……………………………………………. रू 12,001/-
आजीवन…………………………………………. रू 25,001/-
संरक्षक……………………………………………. रू 50,001/- निर्धारित है,

इससे आश्रम सेवा कार्य का संचालन यथा-रसोई, भण्डार, गौ-सेवा अतिथि सन्त-सेवा, भण्डारी का वेतन आदि का व्यय वहन किया जाता है, साथ ही साथ आश्रम में निवास करने वाले ब्रम्हचारीगण, सन्यासियों की सेवा पर भी खर्च किया जाता है।

5. श्री शौनक आर्ष विद्या प्रन्यास ट्रस्ट का गठन श्री स्वामी जी द्वारा किया गया है, जिसकी आजीवन सदस्यता शुल्क रू0 2001.00 मात्र है। सभी साधकों से इसकी सदस्यता ग्रहण करने का अनुरोध है।

6. आश्रम में सत्संग हाल, ब्रम्हचारी निवास, अध्ययन कक्ष, साधक निवास आदि का निर्माण वांछित है। इस सेवा में उदारता से आर्थिक सहयोग प्रार्थनीय है।

7. ‘भूमिदान सभी दानों में सर्वोत्तम दान है‘, इसलिए इस सेवा कार्य में मुक्त हस्त से सेवा का आवाहन है।

8. श्री दक्षिणामूर्तेश्वर महादेव मन्दिर में सुबह-शाम पूजन व आरती होती है। सांयकाल 05ः00 बजे से 06ः30 बजे के मध्य ‘शिव महिम्न‘ का नित्य पाठ किया जाता है। मन्दिर के श्रृंगार, पूजन, विग्रह, हवन तथा पुजारी के वेतन व्यय हेतु सेवा देकर पुण्य लाभ प्राप्त करें।

9. ‘श्री शौनक-सुधा‘ पत्रिका मासिक रूप से प्रकाशित होती है, जिसमें वार्षिक, पंचवार्षिक, संरक्षक एवं आजीवन सदस्य बनकर प्रतिमाह सारगर्भित लेखों का अध्ययन लाभ करें।
10. प्रातः 08ः00 बजे से 09ः00 बजे सायं 04ः00 बजे से 05ः00 बजे तक देश के किसी प्रतिष्ठित सन्यासी द्वारा महात्मा द्वारा प्रतिदिन आश्रम के श्रुत्यालय में प्रवचन होता है।

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