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तत्व का श्रवण करके भी अज्ञानी अपनी मूढ़ता का त्याग नहीं करता, वह बाह्य रूप से तो निसंकल्प हो जाता है पर उसके अंतर्मन में विषयों की इच्छा बनी रहती है।

हरि ऊँ !

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