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साधक जिस किसी स्थिति में क्यों न हो उपनिषद का ज्ञान उसे गति प्रदान करता है अर्थात् जहाँ वो स्थित है उसे वहां से आगे बढ़ाता है। तमोगुणी साधक को रजोगुणी बनाता है, रजोगुणी को सतोगुणी और सतोगुणी को गुणातीत बनाकर आत्मनिष्ठ बनाता है। 

हरि ऊँ !

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