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विशिष्ट ज्ञान से रहित सुषुप्ति है, उस ज्ञान की उत्पत्ति ही स्वप्न और जाग्रत अवस्था है। मैं उनका साक्षी और सदा ज्ञान स्वरूप होने के कारण उन अवस्थाओं वाला कैसे हो सकता हूँ?

हरि ऊँ !

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