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वृत्‍तियों का सोना ही सुषुप्ति है, वृत्‍तियों का जागना ही जागृति है, वृत्‍तियों का चलना ही स्वप्न है। परिच्छिन्न अहं में ही यह तीनों अवस्थाएं हैं । मैं इन तीनों का साक्षी हूँ ।

हरि ऊँ !

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